एनआरआई कविता के लिए खोज परिणाम ( 1-10 )
ध्यानमग्न झील ...
निर्भय गहाराई बीच में किनारे बतला सकते थाह तन की डुबकी का आनंद नहीं उसमें पर समीप होने का छू लेने का उत्साह ध्यानमग्न साध्वी के निकट बैठ लेने की चाह। श्वास मंद उपवास मौनव्रत भी कठोरतम नख से शिख न क्र...
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साबुत बचा न कोय ! ...
करती रहीं भगवान बने मानव ने सबकुछ नष्ट कर डाले। हरियाली किसे कहते हैं इस प्रश्न का समाधान म‍ुश्किल हुआ उदाहरण की जगह ऊँची-ऊँची इमारतें हैं और दिल-दिमाग को झुलसाती गर्मी कृत्रिम शीतल हवाओं ने खुली हवा...
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दूर के ढोल ...
तो भईया हम बहुत-बहुत पछतावे हैं जब तक अपने देश रहे थे विदेस के सपने सजाए थे जब हिन्दी बोले की बारी थी अँग्रेजी बहुत गिटपिटाए थे कोई खीर जलेबी इमरती परोसे तब पीजा हम फरमाए थे वहाँ टीका, सेन्दूर, साड़ी...
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वेट लौस ...
- हरिबाबू बिंदल टीवी पर दिखला रहे, वेट लौस के एड उन्हें देख हो जाता है, अपना मन कुछ सैड। अपना मन कुछ सैड, देह पतली दिखलाते कंचन-सी काया, 'डॉलर पर पौंड' घटाते। हड्‍डी पसली दिखे, क्या वह सुंदरता है? हमको तो 'पहले वाला', अच्छा लगता है। साभार - गर्भनाल...
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नि:शब्द प्रेम प्रतिज्ञा ...
और वो वर्षों का एकाकीपन है तेरी लाज के आँचल पर अब तक ठिठका मेरा मन है। सिमटे सकुचे ‍तुम बैठे थे जैसे उस पहली अपनी मुलाकात में अब भी वैसे ही मिलते हो मुझको हर भीगी सीली श्यामल रात में। अपनी मृग-चंचल आ...
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हवा बहती है ...
आँधी तूफान घाट‍ी झकझोर, समुद्र में उफान। कभी श‍ीतल, मन लुभाती कभी लू बन करके तपाती हवा, प्राण वायु देती है कभी प्राण भी हर लेती है। उपद्रव मचा देती है घरों-बस्तियों को ढहा देती है कभी रुक जाती है पसी...
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परित्यक्ता : भाग-3 ...
नहीं जा रही थी क्योंकि काफी कमजोर हो गई थी। फिर एक दिन शाम दफ्तर से लौटते समय राजीव वंदना के घर आए तो थोड़े परेशान से थे। लगता था जैसे कुछ कहना चाह रहे थे परंतु संकोचवश कुछ बोल नहीं पा रहे थे। उसने म...
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मुहब्बत से गुजर ...
जामो-मीना के तअय्युन से है बाला साकी जर्फ देखा नह‍ीं जाता किसी पैमाने से। आओ तज्दीदे-वफा फिर से करें हम वर्ना बात कुछ और उलझ जाएगी सुलझाने से है समझना तो मुहब्बत से गुजर ऐ हमदम बात आएगी समझ में न यूँ...
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प्रवासी कविता : रे मन ...
की डिग्रियाँ हासिल कीं। 16 सालों तक विभिन्न स्कूलों में अध्यापन करने के बाद वर्तमान में बहरीन में पढ़ाती हैं। मन कर तू चिंतन सदा सच्चाई और मृत्यु का मृत्यु है श्वाश्वत अन्य सब हैं नश्वर। देता सभी को ...
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इंद्रजीत की पुस्तक पर संगोष्ठी ...
पंजाबी और हिन्दी में कविता लेखन, दर्शन, मनोविज्ञान और इतिहास में विशेष रुचि। नया ज्ञानोदय, अनुभूति पत्रिकाओं में कविताएँ, समीक्षा एवं पर्यावरण विषयक आलेखों... कि इंद्रजीत की यह लंबी कविता शहीद भगतसिंह के क्रांतिकारी बिंब को बड़ी खूबसूरती से उभारती है। भगतसिंह को नायक के रूप में उभारने वाला बहुत सारा काव्य रचा...
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