काव्यसंसार के लिए खोज परिणाम ( 1-10 )
Treasure of Literature ...
' Webdunia Hindi: विविध साहित्य काव्यसंसार" href="/contmgmt/xmlfeeds/rss/miscellaneous_literature_poemsxml" / काव्यसंसार काव्यसंसार 13 अक्टूबर 2007 पिछले सन्दर्भ...
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तुम, मैं और हम ...
मैं मैं कभी तुम्हारी नहीं हो सकी क्योंकि हर वक्त आड़े आ गया मेरा 'मैं' और तुम्हारा ' मैं' । हम हम 'हम' कभी नहीं हो सकें क्योंकि हम इसी 'वहम' में रहें कि हमारा 'अहम' नहीं रहा । जबकि हर बार हम में 'व' ...
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मैं दुआ का शहर बसाने वाला था ...
था वह लड़की कब की मुड़ी याद आया मैं किस को आवाज लगाने वाला था तुमने क्यूँ बारूद बिछा दी धरती पर मैं तो दुआ का शहर बसाने वाला था उसने भी आँखों में आँसू रोक लिए मैं भी अपने जख्म छिपाने वाला था घर के चराग...
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तीसरी जाति का दर्द ...
गई/बगैर ओढ़े रेशा-रेशा बुनी चादर का होना, न होना ही था जैसा नहीं था सड़क और पैर के बीच मंजिल जैसा कुछ उनके पास नहीं होती, सपनों की जाति सोने के पहले/ या जागते गुनतारों में क्या सोचते होंगे वे। भूत भविष...
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जिंदगी खूबसूरत हो गई ...
साँझ की खूबसूरती मन में लिए दिए जलाए तो रोशनी दुगनी हो गई। सुबह की लाली को नमन किया तो जिंदगी खूबसूरत हो गई। हवा को गहरे तक महसुस किया तो मानो जन्नत मिल गई।...
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मेरी संतान के सपने बचा लो ...
बसंत के हाथ खाली चाहो तो मिटा दो मुझे पर जागते रहें मेरी संतान के स्वप्न कहाँ गया मेरे प्रिय का स्वच्छ यौवन कोई गोपनीय क्षय कीट कुरेद कुरेदकर खा रहा है आँखों के कोनों में सिमटा है पराभवपुंज फुस्फुस ध...
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वो कभी मिल जाए मुझको साँसों के करीब ...
खबर जारी करूँ वो कभी मिल जाए मुझको अपनी साँसों के करीब होंठ भी हिलने न दूँ और गुफ्तगू सारी करूँ तू भी अपना और गमे दुनिया भी घर का एक फर्ज किसका दिल रक्खू मियाँ किसकी दिल-आजारी करूँ जाने ऐसी कौन सी बे...
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गुलाबों ने कहा हँस के... ...
बहुत दिन बाद कोयल पास आकर बोली है, पवन ने आके धीरे से कली की गाँठ खोली है। लगी है कैरियाँ आमों में, महुओं ने लिए कूचे, गुलाबों ने कहा हँस के हवा से अब तो होली है।...
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किसी नाजुक तितली की मानिंद ...
फाल्गुनी मेरे मन के भाव किसी नाजुक तितली की मानिंद होते हैं अभी आए, अभी उड़ चलें, लम्हा भर में जो पराग ग्रहण किए, वो कविता बन गए, पन्नों को छू कर।...
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तुम मेरे पास हो... ...
लेकर... उँगलियों की शरारत तक तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में कभी बिखरे हो खुशबू बनकर... जिसे अपने देह से लपेट, आभास लेती हूँ तुम्हारे आलिंगन का जाने कितने रूप छुपे हैं तुम्हारे, मेरी बन्द पलकों...
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