नज़्म तुम के लिए खोज परिणाम ( 1-10 )
अमृता प्रीतम : शब्दों की संगिनी ...
करने वाली रचनाकार अमृता प्रीतम ने साहित्य साधना के जरिए पंजाबी को विश्व साहित्य में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं। उनकी रचना-यात्रा वर्तमान दौर का जीवंत दस्तावेज है। अमृता प्रीतम ने अपनी ...
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उर्दू साहित्‍य | हिन्दी शायरी | नज़्म | Urdu Literature ...
नज़्म...
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जंग : नज़्म ...
जंग बे-घर बे-सहारा सर्द ख़ामोशी में बिखर के ज़र्रा ज़र्रा फैलती है, तेल, घी, आटा खनकती चूड़ियों का रूप भर कर बस्ती-बस्ती डोलती है, दिन दहाड़े हर गली कूंचे में घुस कर बन्द दरवाज़ों की सांकल खोलती है, मुद्दत...
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नज़्म 'बलूग़त' (वयस्क) ...
में मेरी आधे अधूरे मिसरे मेरे गले में बाँहें डाले झूलते रहते ज़ेहन के गेहवारे में हमकते, दिल के फ़र्श पर रोते मचलते, नोक-ए-क़लम पर शोर मचाते, ज़िद करते, माअनी की तितलियों के पीछे दौड़ते फिरते थे अल्फ़ाज़ मे...
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Urdu literature : Nazm ...
बरसात की परियाँ आ गई हैं दिल देने की रुत आई है सीनों में उमंग समाई है अरमानों ने ईद मनाई है उम्मीदें जवानी पा गई हैं सावन की------- कहीं सुंबुल-ओ-गुल की बहारें हैं कहीं सर्व-ओ-सुमन की क़तारें हैं कहीं...
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जैसे चुपचाप बरसता है तसव्वुर तेरा (चुपचाप,बरसता,तसव्वुर,तेरा,गुलज़ार,,झड़ी,रवींद्र ...
में इस बार गुलज़ार की नज़्म झड़ी रवींद्र व्यास ( Ravindra Vyas WD बंद शीशों के परे देख, दरीचों के उधर सब्ज़ पेड़ों पे, घनी शाखों पे, फूलों पे वहाँ कैसे... तसव्वुर तेरा गुलज़ार की नज़्म झड़ी) एक कवि की संवेदना किस तरह से एक दृश्य में थरथराती है या एक दृश्य किस तरह से कवि की संवेदना में थरथराता है, यह देखना...
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नज़्म : 'वतन के पासबाँ' (नज़्म 'वतन के पासबाँ' स्वतंत्रता ...
की शान=इस ज़मीं की आन-बान एक क़ालिब एक जान=एकता के राज़दान तुझसे है वतन की शान=ऎ वतन के पासबान तूने उठ के देश की=जगमगा दी ज़िन्दगी अब उठेगी क्या इधर=चश्मे दुश्मनाँ कभी है अदू का रंग फ़क़=मिल गया उसे सबक़ तो...
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Untitled
हसीन फूलों की रानाइयाँ निसार करूँ सितारे चाँद कभी, कहकशाँ निसार करूँ बहार पेश करूँ गुलसिताँ निसार करूँ जहाने-हुस्न की रंगीनियाँ निसार करूँ ज़मीं निसार करूँ आसमाँ निसार करूँ तेरे शबाब पे सारा जहाँ निसा...
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Urdu literature : Nazm ...
8 जुलाई 2008( 16:28 IST ) उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ॥ Aziz Ansari WD जब तलक सा ँस है भूख है प्यास है ये ही इतिहास है रख के कांधे पे हल खेत की ओर चल जो हुआ सो हुआ॥ मंदिरों में भजन मस...
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मजाज़ की नज्म आवारा ...
शहर की रात और मैं, . नाशा द-ओ- नाकार ा फिरूँ ( दुखी) ( बेकार) जगमगाती जागती सड़कों पे आवारा फिरूँ ग़ैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ (इधर-उधर,दरवाज़े-दरवाज़े) ऎ ग़म-ए-दि ल क्या करूँ, ऎ वहशत-ए-दिल क...
hindi.webdunia.com/miscellaneous/urdu/nazm/0804/29/1080429009_1.htm - 40.00kb
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