मिर्जा़ ग़ालिब के लिए खोज परिणाम ( 1-10 )
तेरे कूंचे से हम निकले ...
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले - मिर्जा़ ग़ालिब...
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1857 का कत्ले आम और गालिब ...
21:23 IST ) 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्रा म के दौरान दिल्ली में अं ग्रे जों द्वारा किए गए कत्लेआम में उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब के भाई को भी गोली मार दी गई थी। गालिब ने अपनी रचनाओं में भले ही ...
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हर एक बात पे कहते ...
क्या है न शोले में ये करिश्मा, न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ कि वो शोख़े-तुन्द-ख़ू क्या है चिपक रहा है बदन पे लहू से पैराहन हमारी जेब को अब हाजते-रफ़ू क्या है जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा कुरे...
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वतन की रेत मुझे एडियां रगड़ने देमुझे यकीं हे पानी यहीं ...
वतन की रेत मुझे एडियां रगड़ने देमुझे यकीं हे पानी यहीं से निकलेगा / 12 November, 2008 12:41 PM उपयोगकर्ताओं के उत्तर उत्तर: 1 वाह वाह वाह वाह वाह वाह मिर्ज़ा गालिब के बाद आप ही हों राही, क्या तड़प है क्या आग है तू सच्ची दुनिआ को मिटा के रहेगा...
quest.webdunia.com/question.aspx?LangId=2&qid=7542 - 106.71kb
ग़ालिब का ख़त-43 ...
आए हुए है। मैंने हुसैन मिर्जा़ साहिब को रामपुर से लिखा था कि यूसुफ़ मिर्जा़ को मेरे अलवर तक न जाने देना। अब उनकी ज़बानी मालूम हुआ कि वह मेरा ख़त उनको... भी किया जाए। मुज़फ़्फ़र मिर्जा़ का और अमशीरा साहिबा का आना, तो कुछ जरूर नहीं, शायद आगे बढ़कर कुछ हाजत पड़े। बहरहाल, जो होगा वह समझ लिया जाएगा। तुम चले...
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ये न थी हमारी किस्मत कि विसालेयार होता ...
कि विसालेयार होता अगर और जीते रहते यही इन्तजार होता तेरे वादे पर जिये हम तो यह जान झूठ जाना कि खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता तेरी नाजुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार ...
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ग़ालिब का ख़त-38 ...
पहुँचा। ख़ैर-ओ-आ़फि़यत तुम्हारी मालूम हुई। क़तए जो तुमको मतलब थे उसके हसूल में जो कोशिश हीरासिंह ने की है, मैं तुमसे कह नहीं सकता। निरी कोशिश नहीं, रुपया ‍सर्फ़ किया। पंद्रह रुपया जो तुमने भेजे थे वह...
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ग़ालिब का ख़त-34 ...
तो उनके ख़त के न आने से डरा था कि कहीं मुझसे आजुर्दा न हों। बारे जब तुमको लिखा और तुमने ब-आईन-ए-मुनासिब उनको इत्तिला दी, तो उन्होंने मु्‍झको ख़त लिखा। चुनांचे परसों मैंने उसे ख़त का जवाब भेज दिया। तु...
hindi.webdunia.com/miscellaneous/urdu/galibletters/0812/11/1081211073_... - 1686.00kb
ग़ालिब का ख़त-42 ...
यूसुफ़ मिर्जा़, मेरा हाल सिवाय मेरे ख़ुदा और ख़ुदाबंद के कोई नहीं जानता। आदमी कसरत-ए-ग़म से सौदाई हो जाते हैं, अक़्‍ल जाती रहती है। अगर इस हजूम-ए-ग़म में... मीर नसरुद्दीन, मिर्जा़ आ़शूर बेग मेरा भाजना, उसका बेटा अहमद मिर्जा़ उनईनस बरस का बच्चा, मु्स्तफ़ा ख़ाँ, क़ाज़ी फ़ैज़ उल्ला, क्या मैं उनको अपने अज़ीज़ों...
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हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी.... ...
भी कम निकले डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गरदन पर वो ख़ूँ जो चश्म ए तर से उम्र भर यूँ दमबदम निकले निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले भरम खुल जाए...
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