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रवीन्द्र व्यास
के लिए खोज परिणाम ( 1-10 )
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रवीन्द्र व्यास रवि
संगत साहित्य गुलज़ार रवीन्द्र व्यास
रवीन्द्र व्यास ek rat to gulajar
रवीन्द्र व्यासhimasen joshi
ओम व्यास व्यास
कुछ कम रोशन है रोशनी, कुछ कम गीली हैं बारिशें ...
होना हमें कोई नया अर्थ दे रहा है। उसके होने से हमारा जीवन कुछ ज्यादा धड़कता हुआ लगता है। यदि कोई कवि अपनी प्रिया के लिए यह कहे कि तुम्हारे होने से ही फूल कुछ ज्यादा सुर्ख हैं, तुम्हारे होने से आसमान
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/sangat/0905/17/1090517014_... - 5530.00kb
जीवन से बड़ी नहीं हो सकती है रचना ...
और फिर किसी हवा का चलना और उससे किसी हरे पेड़-पौधों का लय में हिलना। वे बारिश के पानी में नहाकर कितने ताजादम और खूबसूरत लगते हैं। बारिश के बाद निकली धूप इन्हें और चमकदार बना देती है। ये कितने सहज और फ
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/sangat/0908/17/1090817033_... - 4178.00kb
साँवली लड़की परेशान है ...
उसकी कविताएँ कम बोलती हैं। और बहुत कम बार ऐसा होता है कि कवि कम बोलता है और उसकी कविताएँ ज्यादा बोलती हैं। शुक्रवार की शाम को कविताएँ बोल रही थीं, मन को छू रही थीं और श्रोता उसे खूब सराह भी रहे थे। स
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/articles/0906/22/109062207... - 5370.00kb
हम पर पत्तियाँ गिर रही हैं ...
और उस पर बनी मेरी पेंटिंग प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह गद्य अपनी काव्यात्मक संवेदना में जीवन के मर्म को लगभग अलक्षित दृश्य में पहचानने-समझने की एक विनम्र कोशिश लगती है। इसमें पतझर, दुःख, विलगाव, मृत्यु के
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/sangat/0812/12/1081212078_... - 3798.00kb
बाकी सब जा चुके हैं... ...
समुद्र की लहरों में डूब गया है। जहाँ यह विलाप लहरों में डूबता है, वहाँ एक सफेद पंछी अपने पंख फड़फड़ाते हुए रुका हुआ है। बाकी सब जा चुके हैं। इन पंखों की फड़फड़ाहट की आवाज लहरों-सी उठती हुई विलाप को व
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/poems/0812/04/1081204070_1... - 1672.00kb
गुनहगार तो बच्चा था, बाकी सब बरी थे ...
था। मेरे ताऊजी जिन्हें हम बड़े दादा कहते थे हमें यहाँ अक्सर शाम को खेलने के लिए ले आते थे। यहाँ की किसी टूटती बेंच पर या किसी पेड़ के नीचे दोपहर में बूढ़े झपकी लेते थे। परीक्षा के दिनों में कुछ लड़को
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/apnamanch/0812/08/10812080... - 4530.00kb
वह आँगन नहीं, धूप नहीं ...
बिल्डिंगें बन जाने से सूरज बारह बजे के पहले दिखाई ही नहीं देता। अब धूप की जगह आँगन में बिल्डिंग की परछाइयाँ दिखाई देती हैं। पहले पिता सूर्य नमस्कार करते थे, अब करते तो लगता बिल्डिंगों को नमस्कार कर र
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/apnamanch/0811/24/10811240... - 0.00kb
पनप चुका है सांस्कृतिक माफिया ! ...
और सामाजिक-सांस्कृतिक कारण हैं। पहली बात तो यह कि अब अमीरी संस्कृति का दबदबा है। यह लगातार बढ़ रही है। इसलिए बाजार की ताकतें हावी हैं। पहले लेखक बाजार के खिलाफ लिखता था, प्रतिरोध करता था, अब लेखक भी
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/interview/0907/03/10907030... - 6630.00kb
हम सबमें अपना शहर धड़कता है ...
उसे अपने लिए एक स्थायी इतिहास बना देना सदैव ही सबसे मुश्किल काम है। और इसका कोई बहुत बड़ा, व्यावहारिक बुद्धि से लबरेज, लाभ-हानिवाला कारण बताना लगभग नामुमकिन है। याद करें, `नसीम´ फिल्म में बूढ़े दादाज
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/sangat/0907/19/1090719022_... - 6808.00kb
खिड़की खुलती है पर कोई झाँकता नहीं ...
को याद रहे। बाहर को यह अहसास बना रहे कि अंदर है। खिड़की अंदर और बाहर दोनों को एक दूसरे का एहतराम करने का एक सीधा-साधा अवसर है। आकाश हर घर पर छाया है पर कई बार वह खिड़की से दिख पड़ता है। खिड़की के द्वारा
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hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/sangat/0908/02/1090802018_... - 3070.00kb
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