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असहाय सी खोज रही हूँ ...
यथार्थ के 'अलार्म' से उठा दिया अब मेरी उनींदी आँखों में सपनों की खुमारी तो है, पर स्नेह, ममत्व और औदार्य जैसे शब्दों को असहाय सी खोज रही हूँ न वे शब्द मिल रहे हैं और न उनके अर्थ, तुम्हीं कर सकते थे य...
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पूरे चाँद की रात ...
विजय कुमार सप्पत्ती आज फिर पूरे चाँद की रात है और साथ में बहुत से अनजाने तारे भी हैं और कुछ बेचैन से बादल भी हैं... इन्हें देख रहा हूँ और तुम्हें याद करता हूँ खुदा जाने तुम इस वक्त क्या कर रही होंगी... खुदा जाने तुम अब मेरा नाम भी याद है या नहीं आज फिर पूरे चाँद की रात है।।...
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