हमारी पसंद, वली, मोमिन, ग़ालिब, मीर के लिए खोज परिणाम ( 1-7 )
मुसाफ़िर हैं हम तो « Their Words, Their Voice ...
Archives- हैं हम तो चले जा रहे हैं बड़ा ही सुहाना ग़ज़ल का सफ़र है। पता पूछते हो तो इतना पता है हमारा ठिकाना गुलाबी नगर है। ग़ज़ल ही हमारा अनोखा जहाँ है ग़ज़ल प्यार की वो हसीं दासताँ है। इसे जो भी सुनता है, वो...
ghazallyrics.wordpress.com/2006/09/13/मुस�%a... - 52.44kb
आप बन्दा नवाज़ क्या जानें ...
है शराब आहिस्ता आहिस्ता वली याद करना हर घड़ी उस यार का है वज़ीफ़ा मुझ द्लि-ए-बीमार का वली हमारे आगे तेरा जब कसू ने नाम लिया दिल-ए-सितमज़दा को हमने थाम थाम... को हमने थाम थाम लिया मीर उलटी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारिए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया मीर मीर उन नीम बाज़ आँखों में सारी मस्ती...
hindi.webdunia.com/miscellaneous/urdu/pasand/0811/21/1081121048_1.htm - 0.00kb
BBCHindi.com | पत्रिका | इंसानियत के शायर थे यगाना ...
लेखक यगाना चंगेज़ी को ग़ालिब की मुख़ालिफ़त महंगी पड़ी मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ग़ालिब अपने रंग-ढंग के अनोखे इंसान थे. उनका जन्म 27 दिसंबर, 1869 को हुआ था.... किसी दूसरे का शेर कम ही पसंद आता था, लेकिन कभी इत्तेफाक़ से ऐसा हो जाता था, तो उनकी प्रशंसा आगे पीछे की सारी हदों को फलांग जाती थी. मोमिन खाँ उनके समकालीन...
bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/10/071017_nida_column.shtml - 96.55kb
ग़ज़ल - Hindi Literature ...
श्रेणी:ग़ज़ल- कुरैशी अपने तड़पने की / मीर तक़ी 'मीर' अपने पास और क्या रहा है मियाँ / सुरेश चन्द्र शौक़ अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले / इब्ने इंशा अपने हर लफ़्ज़... है हर तरफ़ आलम में / वली दक्कनी अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा / गा़लिब अर्ज़—ओ—समाँ में / साग़र पालमपुरी अलग मुस्कान मुद्राएँ अलग हैं / जहीर...
hi.literature.wikia.com/wiki/श्रे�%A... - 244.44kb
मैं तुझे मीर कहूं, तू मुझे गालिब « My Dream ...
मैं तुझे मीर कहूं, तू मुझे गालिब- ‘भारत रत्न’! मैं तुझे मीर कहूं, तू मुझे गालिब By Rajesh Roshan इस जुमले के बारे में आप लोगों को तो खूब पता होगा। यह एक तरीके की मार्केटिंग है। ‘मैं तुझे... है। ‘मैं तुझे मीर कहूं, तू मुझे गालिब’। रजनीकांत ने शिवाजी फिल्म के रीलीज के बाद उठे एक पत्रकार के सवाल के जवाब में कहा कि अमिताभ बच्चन भारतीय सिनेमा...
merasapna.wordpress.com/2007/06/22/main-tujhe-mir-kahu-tu-mujhe-galib/ - 30.98kb
BBCHindi.com | पत्रिका | पुराना मुशायरों और नए मुशायरों ...
यह एक चर्चा का विषय है. हमारी संस्कृति में संतों की मौखिक परंपरा रही है. कबीर दास स्वयं को अपढ़ कहते थे, परंतु ढाई अक्षर प्रेम के काव्य रूप से वह संगत... ज्ञान प्रदान करते थे. ग़ालिब से पहले मीर और उनके बाद मीर दर्द के घरों में मुशायरे हुआ करते थे. इन सभाओं में शायर और श्रोता एक स्थान पर जमा होते थे और...
bbc.co.uk/hindi/entertainment/story/2007/07/070719_nida_column.shtml - 94.69kb
गुलशने-ग़ैर वज़ा होना था « तख़लीक़-ए-नज़र ...
शायिर ‘नज़र’ की शायिरी का उद्भव [The Creation of Poetry of Poet 'Nazar']- ग़ज़ल Leave a Comment शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००४ —————————– उफ़ वो नज़ाकत उनके नाज़ुक लबों की कसमसाके नींद उड़ गयी मेरी शबों की —————————- और बीमारिए-इश्क़ में क्या होना था दिल को दिमाग़ से...
vinayprajapati.wordpress.com/2007/12/18/गुल�... - 115.84kb
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